शुक्रिया ... एक शर्मीली शख़्सियत का
मैंने अपनी पिछली चिट्ठी 'भगवान की दुनिया - तभी दिखायी देगी जब खिड़की साफ हो'
पर भेड़ाघाट-धुआंधार का सुन्दर चित्र लगाया था। वह मेरे द्वारा नहीं खींचा
गया था । उसे मैंने कहीं से चुराया था। मेरा वायदा था कि मैं उसके बारे
में, अगली चिट्ठी में लिखूंगा - यह चिट्ठी उसी चोरी के बारे में है।
मैंने भेड़ाघाट-धुंआंधार का चित्र नितिन जी के चिट्ठे 'पहला पन्ना' से लिया था। इस चिट्ठे पर कुछ बेहतरीन चित्र हैं। इस चिट्ठी में
सारे चित्र उसी चिट्ठे से ही लिये गये हैं।
मैं जब पहली बार उनके चिट्ठे पर पहुंचा तो मुझे लगा कि वे किसी व्यावसायिक छविकार से कम नहीं हैं। मैं नहीं जानता वे क्या करते हैं पर शायद कंप्यूटर इंजीनियर हैं। यह मैं उनके अपने बारे में लिखे परिचय के आधार पर कह रहा हूं। वे लिखते हैं कि वे तकनीक से जुड़े हैं और उनका व्यवसाय - माथा पच्ची है। वे, अपने बारे में लिखते हैं
मेरी उनसे मित्रता उनकी उनकी एक चिट्ठी पर टिप्पणी करने के बाद शुरू हुई। यह आज भी बरकरार है। इसके लिये मैं अपने को खुशकिस्मत और भाग्यशाली मानता हूं। वे मेरी चिट्ठियों पर अक्सर टिप्पणियां करते हैं हांलाकि मैं उनके चिट्ठे पर टिप्पणी करने से चूक जाता हूं। गलत बात है न। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का बड़प्पन दिखाता है कि वे दूसरे के चिट्ठे पर टिप्पणियां अपने चिट्ठे पर टिप्पणियां पाने के लिये नहीं करते। यह, टिप्पणियों के विश्लेषण में लिखी गयी, बहुत सी चिट्ठियों को नकारता है।
लगभग तीन साल पहले, उन्होंने मुझे एक पहेली भेजी जिसमें में ४=५ सिद्ध किया गया था। मैंने जब उनके पास पहेली का हल भेजा तब उन्होंने मुझे इस पर कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने इस पेहली को 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' नामक चिट्ठी में लिखा। मैंने इसका हल नहीं लिखा क्योंकि इसका हल कुछ चिट्ठाकार बन्धुवों ने उसी चिट्ठी पर टिप्पणियों द्वारा दे दिया था।
मैंने उक्त पहेली की व्याख्या अलग तरीके से 'आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन' नामक चिट्ठी में लिखी। शायद वह नहीं सोचते थे कि इस पहेली की इस तरह से भी व्याख्या की जा सकती है।
'एक अनमोल तोहफ़ा' चिट्ठी में, सवालों के जवाब देने के लिये, उन्हें भी नामित किया गया था। सवालों का जवाब उन्होंने अपनी चिट्ठी 'खेल खेल में' लिखा है। सवाल, 'क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?' का वे जवाब देते हुऐ लिखते हैं,

प्रेम की अभिव्यक्ति शायद इससे बेहतर ब्यान नहीं हो सकती
यह सच है कि उनके द्वारा भेजी गयी पहेली की व्याख्या करते समय असमंजस में था। कई बार लगा कि मैं उस व्याख्या को भूल जाऊं। फिर हिम्मत कर, उसे प्रकाशित किया। यह ठीक किया क्योंकि यह मेरी अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियों में से एक है। इस पर आज भी लोग सर्च कर पढ़ने आते हैं।
उक्त चिट्ठी के कारण ही, मैंने कुछ अन्य अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियां, 'मां को दिल की बात कैसे बतायें','मां को दिल की बात कैसे पता चली', 'यौन शिक्षा जरूरी है', और 'उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी' जैसी चिट्ठियां लिखीं। सच तो यह है कि मेरे उन्मुक्त चिट्ठे या छुटपुट चिट्ठे पर यौन शिक्षा (यहां और यहां देखें) पर लिखी सारी चिट्ठियां इसी के कारण लिखीं गयीं। मेरे चिट्ठे पर लोग इस श्रेणियों की चिट्ठियों को, या फिर इस श्रेणी पर, सबसे ज्यादा चटका लगाते हैं।
'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं ...?'
ओफ हो, पहले क्यों नहीं बताया कि आप धुआंधार के चित्र को फिर से देखना चाहते हैं। मैं उसे फिर से दिखा देता हूं। इसमें क्या मुश्किल है।
'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र ...?'हां, हां उसी चित्र के बारे में बता रहा हूं। इतने उतावले क्यों हो रहे हैं।
मैंने भेड़ाघाट-धुंआंधार का चित्र नितिन जी के चिट्ठे 'पहला पन्ना' से लिया था। इस चिट्ठे पर कुछ बेहतरीन चित्र हैं। इस चिट्ठी में
बसन्त ऋतु में पेड़ों की सुन्दरता
मैं जब पहली बार उनके चिट्ठे पर पहुंचा तो मुझे लगा कि वे किसी व्यावसायिक छविकार से कम नहीं हैं। मैं नहीं जानता वे क्या करते हैं पर शायद कंप्यूटर इंजीनियर हैं। यह मैं उनके अपने बारे में लिखे परिचय के आधार पर कह रहा हूं। वे लिखते हैं कि वे तकनीक से जुड़े हैं और उनका व्यवसाय - माथा पच्ची है। वे, अपने बारे में लिखते हैं
'अमेरिका के एक गाँव में एक भारतीय...'अरे, इतना छोटा परिचय जो अपने बारे में कुछ न बताये। क्या आपको नहीं लगता कि वे बेहद शर्मीले हैं? मुझे तो वे शर्मीले व्यक्तित्व के लगते हैं।
मेरी उनसे मित्रता उनकी उनकी एक चिट्ठी पर टिप्पणी करने के बाद शुरू हुई। यह आज भी बरकरार है। इसके लिये मैं अपने को खुशकिस्मत और भाग्यशाली मानता हूं। वे मेरी चिट्ठियों पर अक्सर टिप्पणियां करते हैं हांलाकि मैं उनके चिट्ठे पर टिप्पणी करने से चूक जाता हूं। गलत बात है न। लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का बड़प्पन दिखाता है कि वे दूसरे के चिट्ठे पर टिप्पणियां अपने चिट्ठे पर टिप्पणियां पाने के लिये नहीं करते। यह, टिप्पणियों के विश्लेषण में लिखी गयी, बहुत सी चिट्ठियों को नकारता है।
लगभग तीन साल पहले, उन्होंने मुझे एक पहेली भेजी जिसमें में ४=५ सिद्ध किया गया था। मैंने जब उनके पास पहेली का हल भेजा तब उन्होंने मुझे इस पर कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने इस पेहली को 'चार बराबर पांच, पांच बराबर चार, चार…' नामक चिट्ठी में लिखा। मैंने इसका हल नहीं लिखा क्योंकि इसका हल कुछ चिट्ठाकार बन्धुवों ने उसी चिट्ठी पर टिप्पणियों द्वारा दे दिया था।
मैंने उक्त पहेली की व्याख्या अलग तरीके से 'आईने, आईने, यह तो बता - दुनिया मे सबसे सुन्दर कौन' नामक चिट्ठी में लिखी। शायद वह नहीं सोचते थे कि इस पहेली की इस तरह से भी व्याख्या की जा सकती है।
'एक अनमोल तोहफ़ा' चिट्ठी में, सवालों के जवाब देने के लिये, उन्हें भी नामित किया गया था। सवालों का जवाब उन्होंने अपनी चिट्ठी 'खेल खेल में' लिखा है। सवाल, 'क्या हिन्दी चिट्ठेकारी ने आपके व्यक्तिव में कुछ परिवर्तन या निखार किया?' का वे जवाब देते हुऐ लिखते हैं,
'यहां पर लिखने और पढने से मेरे विचार भी बदले हैं और आम जीवन में होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करने का तरीका भी । उदाहरण के तौर पर मेरी लिखी ४=५ वाली ईमेल और उसका इतना गंभीर मतलब! शायद मैं ऐसा कभी ना सोच पाता।'

प्रेम की अभिव्यक्ति शायद इससे बेहतर ब्यान नहीं हो सकती
यह सच है कि उनके द्वारा भेजी गयी पहेली की व्याख्या करते समय असमंजस में था। कई बार लगा कि मैं उस व्याख्या को भूल जाऊं। फिर हिम्मत कर, उसे प्रकाशित किया। यह ठीक किया क्योंकि यह मेरी अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियों में से एक है। इस पर आज भी लोग सर्च कर पढ़ने आते हैं।
उक्त चिट्ठी के कारण ही, मैंने कुछ अन्य अधिक पढ़ी जाने वाली चिट्ठियां, 'मां को दिल की बात कैसे बतायें','मां को दिल की बात कैसे पता चली', 'यौन शिक्षा जरूरी है', और 'उफ, क्या मैं कभी चैन से सो सकूंगी' जैसी चिट्ठियां लिखीं। सच तो यह है कि मेरे उन्मुक्त चिट्ठे या छुटपुट चिट्ठे पर यौन शिक्षा (यहां और यहां देखें) पर लिखी सारी चिट्ठियां इसी के कारण लिखीं गयीं। मेरे चिट्ठे पर लोग इस श्रेणियों की चिट्ठियों को, या फिर इस श्रेणी पर, सबसे ज्यादा चटका लगाते हैं।
'लेकिन उन्मुक्त जी, आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं ...?'
ओफ हो, पहले क्यों नहीं बताया कि आप धुआंधार के चित्र को फिर से देखना चाहते हैं। मैं उसे फिर से दिखा देता हूं। इसमें क्या मुश्किल है।
हैं न कितना सुन्दर।
'उन्मुक्त जी, यदि आपने अपनी बकबक बन्द नहीं की तो मैं यहां से चला जाउंगा और कसम आपकी, मैं यहां फिर कभी नहीं आउंगा। आप भी न, बस, बिना सवाल सुने बहकने लगते हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि आप भेड़ाघाट-धुआंधार चित्र की बात कर रहे हैं पर पहला चित्र हाथी का क्यों लगा रखा है? क्या आपको सवाल समझ में आया या फिर से बताऊं।'
अरे
भाई, अरे बहना, यह पहले क्यों नहीं बताया। इसका जवाब तो बहुत आसान है। यह
चित्र नितिन जी ने अपने परिचय में अपने चित्र की जगह लगाया है। वहीं से
मैंने लिंक दी है।
'उन्मुक्त जी, उन्होंने हाथी का चित्र क्यों लगया है क्या वे हाथी की तरह भारी-भरकम हैं?'
अब
मैं तो यह कह नहीं सकता। मैं न तो उनसे मिला हूं न ही उनका चित्र देखा है।
इसका सही उत्तर तो वही दे सकते हैं। ऐसे मैं कुछ अनुमान लगा सकता हूं।
लोग
गलत समझते हैं कि जंगल का राजा शेर होता है। शायद यह इसलिये कहा जाता कि
वह मांसभक्षी है। वास्तव में, हाथी शाकाहारी होने बावजूद भी, जंगल का राजा
है क्योंकि वह सबसे शक्तिशाली जानवर है। शेर भी उसके रास्ते में नहीं आता
है। हाथी जिस रास्ते से जाता है शेर उसके लिये वह रास्ता छोड़ देता है।
शायद वास्तविक जीवन में, नितिन जी हाथी जैसे शक्तिशाली व्यक्तित्व के धनी
हैं। ऐसे अन्तरजाल के काल्पनिक संसार में तो वे ऐसे ही लगते हैं।
भगवान की दुनिया - तभी दिखायी देगी जब खिड़की साफ हो
साउथ अफ्रीका की यात्रा विवरण
की इस कड़ी में, क्रुगर पार्क से पिलग्रिम रेस्ट जाते समय रास्ते में पड़ी
जगहें - लिसबन झरना और गॉडस् विंडो - की चर्चा है।
हमें, ग्रास कॉप गॉर्ज (Graskop gorge) देखने के बाद, लिस्बन झरना (Lisbon Falls)
देखने जाना था। मुझे लगा कि वहाँ पर भी धुंध रहेगी और कुछ देख नहीं सकेगें
लेकिन यह झरना कम ऊंचाई पर है इसलिए वहां पर धुंध बिल्कुल नहीं थी।लिस्बन झरना पर सुन्दर नज़ारा था। वहां पहुंचकर मुझे जबलपुर के धुंवाधार झरने की याद आयी। हालांकि यह झरना जबलपुर के झरने की जितना सुन्दर नहीं हैं पर सफाई के मामले में उससे कहीं बेहतर है।

भेड़ाघाट-धुंआंधार का चित्र देखिये। है न लिस्बन झरने से कितना सुन्दर पर सफाई के मामले में बहुत पीछे।
सा
उथ
अफ्रीका में सफाई तारीफे काबिल थी। वे सफाई के मामले में बहुत आगे हैं।
क्या हम कभी साफ रह सकेंगे? हम इतने अधिक हैं कि शायद जब तक हम सब न लगें
तब तक यह संभव नहीं। शायद इसके बाद भी नहीं - भारत मां की भी अपनी कमियां
हैं वह इतनी बड़ी नही जिसमें हम सब समा सकें।सफाई न रहने के कारण, बहुत से लोग अपने देश घूमने नहीं आते हैं। मुझे कश्मीर में मिली फिंनलैण्ड की हेलगा कैटरीना की याद आयी। उन्होंने मुझसे कहा था,
'मुझे भारत पसन्द है। मैं यहां अक्सर आती हूं पर गन्दगी के कारण मेरे बच्चे भारत आना पसन्द नहीं करते हैं।'
हमारा तीसरा पड़ाव गॉडस् विंडो (God's Window) नाम की जगह थी। यह एक गहरी घाटी है जिसका नाम ब्लाइड घाटी (Blyde Canyon) है। घाटी में नीचें एक नदी बहती है। यहाँ पर वर्षा वन (Rain Forest) भी है।
हमें बताया गया कि इस घाटी का नज़ारा बहुत ही सुन्दर है पर धुंध के कारण, हम इसे या फिर नदी को देखने से वंचित रह गये। बाद में हम लोगों ने वहां के चित्र देखे और पिक्चर पोस्ट कार्ड खरीदे।
जिसे देख कर लगा कि शायद हम लोग वास्तव में भगवान की दुनिया देखने से वंचित रह गये। 
यह दोनो चित्र मेरे द्वारा नहीं खींचे गये हैं पर पिक्चर पोस्ट कार्ड से स्कैन कर के यहां प्रकाशित किये गये हैं।
हम लोग दोपहर तक पिलीग्रीम्स रेस्ट (Pilgrim's Rest) पहुँचे। यह जगह वर्ष १८७३ में प्रसिद्व हो गयी थी क्योंकि यहां पर खोदने पर सोना मिला। इसके बारे में इस कड़ी के अगली चिट्ठी पर।
मैं जबलपुर चार बार गया हूं और हर बार भेड़ाघाट-धुंआंधार भी गया था। मुझे यह जगह अच्छी लगती है लेकिन यदि आप यह सोच रहे हैं कि भेड़ाघाट-धुआंधार का चित्र मैंने खींचा है तो आप गलत हैं। यह चित्र, मैंने कहीं से चुराया है। क्या आप उस जगह का अनुमान लगा सकते हैं? नहीं न। इसके पहले मुझे चोरी के जुर्म में जेल हो जाय मैं बहुत जल्दी अपनी अगली चिट्ठी में इस रहस्य का पर्दाफाश करूंगा।
अफ्रीकन सफारी: साउथ अफ्रीका की यात्रा
ऐसा करोगे तो, मैं बात करना छोड़ दूंगी
साउथ अफ्रीका की यात्रा विवरण की इस कड़ी में, क्रुगर पार्क से
पिलग्रिम रेस्ट जाते समय रास्त में पड़ी जगह - ग्रासकॉप गॉर्ज - की चर्चा
है।
पिलीग्रीम्स रेस्ट ( Pilgrim's Rest)
जाने के लिये, हमें सुबह केविल लेने आये। हम लोग लगभग ९ बजे, सुबह
पिलीग्रीम्स रेस्ट के लिए चल दिए। रास्ते में हम लोगों को तीन जगहें देखनी
थी। सबसे पहले हम लोग ग्रास कॉप गॉर्ज (Graskop gorge) देखने गये। यह गहरी सी घाटी है। जिसमें एक तरफ झरना गिरता रहता है।
सुबह के समय हर तरफ धुंध ही धुंध थी इसलिए कुछ अच्छी तरह दिखाई नही दे रहा
था।
'यदि तुम दोनों में से भी कुछ करोगे तो मैं तुमसे बात करना छोड़ दूंगी।'
हम लोग दूसरी तरफ गये जहाँ से यह हो सकता था। वह रास्ते भर जिद करती रही कि मुझे कुछ नहीं करना है । दूसरी तरफ एक जर्मन दम्पत्ति और उनके बच्चे थे जो कि दोनो कारनामे कर रहे थे। उस वक्त कुछ धुन्ध सी थी। इसलिए मुझे लगा कि बीचो बीच से नीचे जाना ठीक न होगा पर रस्सी में लटक कर, दूसरी तरफ तो जाया जा सकता हूँ। मैंने कैमरा मुन्ने की मां को दे दिया और उससे चित्र खींचने को कहा। उसने कहा,
'तुम जो करने जा रहे हो। उसे तो मैं देख भी नहीं सकती हूं चित्र लेने का तो सवाल ही नहीं है।'यह कह कर उसने अपना मुंह दूसरे तरफ कर लिया। मुझे गोवा यात्रा की याद आयी जब मैंने पैरासेलिंग करने की बात की थी। मैंने जर्मन दम्पत्ति से चित्र लेने की प्रार्थना की।
शुरू में तार लटक कर एक तरफ से दूसरी तरफ जाने में डर लगा पर जब मैं बीचो बीच पहुंचा तो सारा डर समाप्त हो गया और मज़ा आने लगा। नीचे पानी था जिसमें झरना गिरता दिखायी दे रहा था। बीच में पहुंचने के बाद मेरे भार से तार कुछ नीचे हो गया था। नीचे कोई धुंध नहीं थी और मैं एक बेहतरीन नज़ारा देख सका। कुछ देर बाद उन्होनें पुन: मुझे वापस खींच लिया।
'उन्मुक्त जी, मुझे तो आपकी बात पर बिलकुल विश्वास नहीं है। आप तो डरपोक हैं। अज्ञात हो कर चिट्टकारी करते हैं, न किसी को फोन नम्बर देते हैं न ही किसी चिट्टाकार मिलन में पहुंचते हैं और न ही किसी से मिलते हैं। आप बहुत सी चिट्ठियों पर टिप्पणियां करना चाहते है पर टिप्पणी नहीं करते। तार में लटक कर घाटी में जाना तो हिम्मत का काम है। यह कार्य आपसे नहीं हो सकता इसलिये कोई चित्र नहीं है इस चिट्ठी में - हांकना बन्द कीजिये, हमें न बनाईये।'
मेरे भाई, मेरी बहना, यह सच है कि मैं अज्ञात हो कर चिट्ठाकारी करता हूं, किसी से नहीं मिलता हूं। बहुत सारी चिट्ठियों पर चाह कर भी टिप्पणियां नहीं कर पाता हूं। लेकिन मेरी भी मजबूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं डरपोक हूं। मुन्ने की मां के अनुसार शायद - मैं ज्यादा ही हिम्मती हूं; अपने वास्तविक जीवन में वह करने पहुंच जाता हूं जिसके बारे में लोग सोचते ही नहीं - इस लिये कई बार अपनी जान न केवल खतरे में डाल चुका हूं। खैर यह उसका सोचना है। लेकिन आप यह चित्र देखें अब तो आपको विश्वास हो गया न कि मैं तार पर लटक कर बीचों बीच गया था।
अब यह मत कह दीजियेगा कि लगता है कि चित्र में कुछ कलाकारी कर दी गयी है :-)
क्या इस यात्रा की अली कड़ी में, हम लोग चलेंगे धुआंधार और देखेंगे ईश्वर की दुनिया - गॉडस् विन्डोज़ से तो यही दिखायी देगा।
अन्तरजाल पर कानून में टकराव
मैंने 'अन्तरजाल की माया नगरी' श्रंखला में अन्तरजाल पर उठ रहे मुद्दों के बारे में चर्चा की थी। यह श्रंखला बहुत पहले समाप्त हो गयी थी। उसके बाद मुझे लगा कि इसके भविष्य के बारे में कुछ लिखना चाहिये। इसलिये मैने दो चिट्ठियां वेब २.० और सॅमेंटिक वेब पर लिखीं।
देशों के कानून अलग अलग हैं। इस कारण अन्तरजाल पर उठ रहे मुद्दों के हल में भी टकराव हो रहा है। मेरे विचार से, इस पर भी कुछ चर्चा, इस श्रंखला में होनी चाहिये इसी लिये यह चिट्ठी प्रकाशित कर रहा हूं।
कानून किसी भी जगह और समय के प्रतिबिम्ब होते हैं। यह उस जगह और समय की नैतिकता के प्रतीक हैं। हांलाकि कानून कितना कारगर है यह बात वहां के कानून के पालन पर निर्भर करती है।
देशों में, मोटे तौर पर कानून एक जैसे होते हैं पर कुछ मूलभूत अन्तर के कारण, कानून में भी अन्तर होता है। वेब ने, देशों की सीमाओं को समाप्त कर दिया है। इसलिये जहां कानून में अन्तर है वहां टकराव की स्थिति पैदा हो गयी है। अभी तक इस समस्या का हल, न तो संतोषजनक रूप से निकला है, और न ही कोई रास्ता समझ में आ रहा है। आइये इसके कुछ उदाहरण देखें।
अश्लीलता देशों की नैतिकता पर निर्भर है। देशों में अश्लीलता के अलग अलग मापदन्ड हैं। बहुत से देशों में जिसे अश्लील नहीं कहा जाता उसे दूसरे देशों में अश्लील कहा जाता है। किस भी देश में स्थित वेबसाइट की सामग्री को दुनिया के किसी और देश में देखा जा सकता है। यदि उस सर्वर की वेबसाइट कुछ ऐसा साहित्य है जो कि उस देश के कानून के मुताबिक अश्लील न हो पर दूसरे देश के कानून के मुताबिक अश्लील हो तो क्या दूसरे देश में उस साहित्य को सर्वर पर डालने वाले को जेल भिजवाया जा सकता है।
यही बात मानहानि (defamation) के कानून में लागू होती है। जो समाग्री एक देश में कानूनी है पर दूसरे देश में गैरकानूनी है। सवाल यह उठता है कि उस सामग्री को किसी दूसरे देश में, जिसके कानून के अन्दर वह गैर कानूनी है, कैसे रोका जाय।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, जर्मनी और फ्रांस में नाज़ी साहित्य या उनके चिन्ह या उनकी बड़ाई करने वाले साहित्य के बेचने पर मनाही है।
नाज़ी पार्टी के शासन के समय जर्मनी का राष्ट्रीय चिन्ह
याहू एक प्रसिद्ध वेबसाइट है।
चित्र क्रंच बेस के सौजन्य सेयाहू फ्रांस, याहू की सहायक कम्पनी है जो कि फ्रांस देश में पंजीकृत है। यह वहां के कानून से बाध्य है। यह नाज़ी चिन्ह या नाज़ियों की बड़ाई करने वाला साहित्य नहीं बेच सकती है। लेकिन सवाल यह है कि याहू वेबसाइट जो अमेरिका के सर्वर पर स्थित है और अमेरिका में पंजीकृत है जिसके कानून में यह सेवा गैरकानूनी नहीं है को क्या फ्रांस के न्यायालय या सरकार ऐसा करने से मना कर सकती है कि वह ऐसा कार्य न करे क्योंकि यह वेबसाइट फ्रांस में भी देखी जा सकती है, जहां यह गैरकानूनी है।
फ्रांस के नागरिक स्वतंत्रता (civil liberty) की दो संस्थाओं ने फ्रांस में याहू पर मुकदमा ठोका। फ्रांसीसी न्यायलय ने निषधाज्ञा जारी कर याहू को इस तरह की पुस्तकें तथा चिन्ह बेचने से मना किया और आज्ञा न मानने पर हर्ज़ाना लगाया। याहू ने इस फैसले के खिलाफ अपील तो नहीं प्रस्तुत की पर अमेरिकन न्यायलय में इस बात का मुकदमा चलाया कि
- वे, यह कार्य वे अमेरिका में कर रहे हैं;
- जहां के कानून के अन्दर यह गैर कानूनी नहीं है;
- इसलिये इस फैसले शून्य घोषित किया जाय।
परीक्षण न्यायालय ने इस फैसले को शून्य घोषित कर दिया। फ्रांस की संस्थाओं ने इसके विरुद्ध अपील प्रस्तुत की जो २-१ से स्वीकार कर ली गयी पर बाद में यह फैसला पुननिरीक्षण के लिये पूरी अपीली न्यायालय के समक्ष पेश हुआ। ११ न्यायधीशों ने मुकदमे सुना और तय किया (433 F.3d 1199) कि,
'An eight-judge majority ... holds ... that the district court properly exercised specific personal jurisdiction over defendants ... A three-judge plurality of the panel concludes, as explained in Part III of this opinion, that the suit is unripe for decision ... When the votes of the three judges who conclude that the suit is unripe are combined with the votes of the three dissenting judges who conclude that there is no personal jurisdiction ... there are six votes to dismiss Yahoo!’s suit.
We therefore REVERSE and REMAND to the district court with instructions to dismiss without prejudice.'
इस फैसले में मुख्यतः अमेरीकी अपीली न्यायालय ने बहुमत द्वारा इस बात पर फैसला देने से इंकार कर दिया कि क्या अमेरीकी न्यायालय, फ्रांसीसी न्यायालय का फैसला रद्ध किया जा सकता है। तीन न्यायधीशों के मुताबिक यह सवाल अभी उठा नहीं है और यह मुकदमा परिपक्व नहीं हुआ है। क्योंकि फ्रांसीसी न्यायालय का फैसला अभी तक अमेरिका में लागू करने के लिये नहीं आया है। तीन न्यायधीशों के मुताबिक न्यायालय को विपक्ष पर निर्णय देने के लिये व्यक्तिगत अधिकार नहीं पाप्त है। इस लिये न्यायालय ने इस मुकदमे को परीक्षण न्यायालय के पास इसे यह कहते हुऐ खारिज करने के लिये भेज दिया कि यह याहू के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं रखेगा।
कानून में यह स्पष्ट नहीं है कि इस परस्थिति में क्या किया जाय – शायद इसका हल भविष्य में ही छिपा है। शायद,
- सारे देशों को एक कानून पर सहमति बनानी होगी, या
- फ्रांसीसी न्यायालय को याहू को
निषेधाज्ञा न देकर, फ्रांस में स्थित, इंटरनेट की सेवायें देने वाली
कंपनियों को यह आज्ञा देनी चाहिये थी, या
- कोई अन्य रास्ता (जो मुझे समझ में नहीं आता) वह ढ़ूढा जाय।









